पाठ्यक्रम: GS1/समाज/GS2/शासन
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व गर्भाधान एवं प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीक (PCPNDT) अधिनियम के सख्त एवं प्रभावी प्रवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया।
परिचय
- न्यायालय ने पुरुष संतान के प्रति समाज में विद्यमान निरंतर प्राथमिकता तथा गंभीरता से जुड़े पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के कारण लिंग-चयन संबंधी प्रथाओं के जारी रहने पर चिंता व्यक्त की।
- हाल के वर्षों में हुई प्रगति को स्वीकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि अभी भी अनेक चुनौतियाँ बनी हुई हैं तथा कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से कम दर्ज किया जा रहा है।
पूर्व गर्भाधान एवं प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीक (PCPNDT) अधिनियम, 1994
- यह भ्रूण के लिंग की पहचान एवं उसके प्रकटीकरण हेतु तकनीक के दुरुपयोग को नियंत्रित करने वाला प्रमुख विधिक ढाँचा है।
- यह गर्भाधान से पूर्व अथवा गर्भाधान के पश्चात किसी भी प्रकार के लिंग-चयन को प्रतिबंधित करता है।
- सभी आनुवंशिक परामर्श केंद्रों, आनुवंशिक प्रयोगशालाओं, आनुवंशिक क्लीनिकों, अल्ट्रासाउंड केंद्रों तथा इमेजिंग केंद्रों का पंजीकरण अनिवार्य है।
- दंड :
- प्रथम अपराध: अधिकतम 3 वर्ष का कारावास तथा ₹10,000 तक का जुर्माना।
- पुनरावृत्त अपराध: अधिकतम 5 वर्ष का कारावास तथा अधिक राशि का जुर्माना।
- चिकित्सा व्यवसायियों का पंजीकरण राज्य चिकित्सा परिषद द्वारा निलंबित अथवा निरस्त किया जा सकता है।
भारत में लिंगानुपात
- जनगणना 2011:

- अखिल भारतीय स्तर पर लिंगानुपात 943 था, जबकि ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में यह क्रमशः 949 और 929 था।
- 0–19 वर्ष आयु वर्ग का लिंगानुपात 908 तथा 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग का लिंगानुपात 1033 था।
- आर्थिक रूप से सक्रिय आयु वर्ग (15–59 वर्ष) का लिंगानुपात 944 था।
- सर्वाधिक लिंगानुपात केरल (1084) में दर्ज किया गया, इसके बाद पुदुच्चेरी (1037) का स्थान रहा।
- न्यूनतम लिंगानुपात दमन एवं दीव (618) में दर्ज किया गया, इसके बाद दादरा एवं नगर हवेली (774) तथा चंडीगढ़ (818) का स्थान रहा।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5), 2021: एनएफएचएस-5 के अनुसार भारत में जन्म के समय समग्र लिंगानुपात 929 था।
- देश की कुल जनसंख्या का लिंगानुपात 1020 अनुमानित किया गया।
भारत में ऐतिहासिक रूप से लिंगानुपात में असंतुलन के कारण
- पुत्र-प्राथमिकता की सांस्कृतिक प्रवृत्ति: परिवार के नाम को आगे बढ़ाने, धार्मिक अनुष्ठानों के निर्वहन तथा वृद्धावस्था में आर्थिक सहारा प्रदान करने के कारण पुत्रों को प्राथमिकता दी जाती रही।
- दहेज प्रथा के कारण पुत्रियों को आर्थिक भार के रूप में देखा गया, जिससे उनकी उपेक्षा हुई।
- लैंगिक भेदभाव: बालिकाओं को पोषण, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं में अपेक्षाकृत कम अवसर प्राप्त हुए, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु-दर अधिक रही।
- कन्या भ्रूण हत्या एवं बालिका हत्या: कुछ क्षेत्रों में बालिकाओं को कम महत्त्व दिए जाने के कारण उनका परित्याग अथवा हत्या की घटनाएँ सामने आती रहीं।
- लिंग-चयनात्मक गर्भपात: अल्ट्रासाउंड जैसी आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के विकास ने भ्रूण के लिंग की पहचान को संभव बनाया, जिससे लिंग-चयनात्मक गर्भपात की प्रवृत्ति बढ़ी।
- आर्थिक कारक: कृषि-प्रधान समाजों में पुत्रों के श्रम को अधिक उपयोगी माना जाता था, जिससे पुरुष संतान की प्राथमिकता सुदृढ़ हुई।
लिंगानुपात सुधार हेतु सरकारी पहलें
- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (BBBP): वर्ष 2015 में प्रारंभ की गई यह योजना लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने, बालिका के महत्व को बढ़ावा देने तथा बालिकाओं की शिक्षा तक पहुँच में सुधार लाने का प्रयास करती है।
- यह कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम एवं बालिकाओं के कल्याण के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी केंद्रित है।
- सुकन्या समृद्धि योजना: यह बालिकाओं के लिए एक बचत योजना है, जो परिवारों को उनकी शिक्षा एवं भविष्य की आवश्यकताओं हेतु बचत करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- इससे बालिकाओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को प्रोत्साहन मिलता है।
- मातृत्व लाभ योजनाएँ: प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) जैसी योजनाओं के माध्यम से गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली माताओं को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- इसका उद्देश्य परिवारों पर आर्थिक भार को कम करना तथा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को सुदृढ़ करना है।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): यह कार्यक्रम महिलाओं के स्वास्थ्य, विशेषकर मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार पर केंद्रित है।
- इसका उद्देश्य महिलाओं एवं बालिकाओं की मृत्यु-दर को कम करना है।
- जन-जागरूकता अभियान एवं विधिक सुधार: सरकार लैंगिक समानता के महत्व के प्रति समाज को जागरूक बनाने हेतु विभिन्न जागरूकता अभियानों का संचालन करती है।
- साथ ही, महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा हेतु आवश्यक कानूनी सुधार भी किए जा रहे हैं।
आगे की राह
- सामुदायिक जागरूकता एवं शिक्षा: ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों को निरंतर जारी रखते हुए बालिका के महत्व तथा लैंगिक भेदभाव के दुष्परिणामों के प्रति व्यापक जागरूकता विकसित की जानी चाहिए।
- महिलाओं के स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में सुधार: विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं एवं बालिकाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कर उनकी मृत्यु-दर को कम किया जा सकता है।
- सामाजिक मान्यताओं एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन: लैंगिक संवेदनशील शिक्षा को प्रोत्साहन देना, पुरुषों की सहभागिता सुनिश्चित करना तथा दहेज प्रथा जैसी कुप्रथाओं का उन्मूलन करना आवश्यक है।
- इससे बालिकाओं के प्रति पारंपरिक पूर्वाग्रहों को समाप्त करने में सहायता मिलेगी।
- सुदृढ़ आँकड़ा-संग्रह एवं अनुसंधान: लिंगानुपात में असंतुलन के कारणों की निरंतर निगरानी एवं शोध किया जाना चाहिए।
- इससे भावी नीतियों एवं हस्तक्षेपों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा तथा वर्तमान पहलों की सफलता का आकलन किया जा सकेगा।
Source: AIR